औद्योगिकीकरण के नाम पर हो रहा है जल, जंगल, जमीन और आसमान के साथ खिलवाड़

प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के जरिये मानव ने विकास के नाम पर आपदा मोल ले ली। अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के नाम पर जल, जंगल, जमीन व आसमान सभी के साथ खिलवाड़ हुआ। जो नदी, तालाब व झील हमें जीवन अमृत प्रदान करतेथे, आज उनमें प्रदूषक तत्वों ने जहर पैदा कर दिया है। बेहिसाब कृत्रिम उर्वरकों के इस्तेमाल ने धरती की सेहत के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी बड़ा असर डाला है। यहां तक कि नुकसानदेह रसायन धरती का सीना चीरते हुए पाताल तक भी पहुंच चुके हैं। उद्योगों की चिमनियों, मोटर वाहनों व अन्य स्नोतों से निकलने वाला धुआं साफ हवा में समाता गया। जंगल और जैव विविधता भी हमारे पर्यावरण के नुकसान की भेंट चढ़ रहे हैं। ऐसे में बिना पर्यावरण को स्वस्थ और स्वच्छ किए हम सभी को कैसे शुद्ध पानी व हवा आदि मुहैया करा पाएंगे।

30 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 21 भारतीय

एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक दुनिया के सर्वाधिक 30 प्रदूषित शहरों की सूची में 21 भारतीय शहर शामिल रहे। शीर्ष 10 की सूची में छह शहर भारतीय रहे। इस सूची में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद को सर्वाधिक प्रदूषित भारतीय शहर माना गया था। वर्ष 2019 में पीएम 2.5 की सांद्रता 110.2 थी, जो अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी की तरफ से तय मानक से नौ गुना ज्यादा थी। वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2019 में भारत में 16.7 लाख से भी ज्यादा लोग असमय काल के गाल में समा गए। यह देशभर में हुई कुल मौतों का 17.8 फीसद था।

अर्थव्यवस्था को भी बड़ा झटका

जल, वायु, मिट्टी व भूगर्भ जल के प्रदूषित होने का दुष्प्रभाव जहां लोगों की सेहत पर पड़ रहा है, वहीं अर्थव्यवस्था की सेहत भी खराब हो रही है। लांसेट पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण की वजह से हुई असमय मौतों और बीमारियों के कारण वर्ष 2019 में भारत  को 2.6 लाख करोड़ रुपये का र्आिथक नुकसान हुआ। यह सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 1.4 फीसद रहा।

रसातल में पहुंचा भूगर्भ जल

देश के 256 जिलों के 1592 विकास खंडों में भूगर्भ जल लगातार रसातल की ओर चला जा रहा है। इसकी मुख्य वजह है भूगर्भ जल का बेहिसाब दोहन व उनका पुनर्भरण न होना। रिपोर्ट बताती हैं कि पंजाब में हर साल भूगर्भ जल एक मीटर नीचे चला जाता है। खतरा सिर्फ यही नहीं है कि भूगर्भ जल रसातल में चला जा रहा है, बल्कि उसमें विषाक्त तत्वों का घुलना कहीं ज्यादा खतरनाक है। जुलाई 2018 में सरकार की तरफ से संसद को उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार, दिल्ली के कुल 11 जिलों में से सात जिलों के भूगर्भ जल में फ्लोराइड अत्यधिक मात्रा में पाया गया, जबकि आठ में नाइट्रेट की मात्रा ज्यादा थी, दो जिलों में आर्सेनिक और शीशा की मात्रा अधिक रही। देश के अन्य हिस्सों की बात करें तो 386 जिलों के भूगर्भ जल में अत्यधिक नाइट्रेट पाया गया, जबकि 335 जिलो में फ्लोराइड की उपलब्धता अधिक थी। 301 जिलों में आयरन, 153 जिलों में आर्सेनिक, 93 जिलों में शीशा, 30 जिलों में क्रोमियम व 24 जिलों में कैडिमम पाए गए।

जल के लिए जंग

हजारों साल से इंसान पानी की गुणवत्ता को लेकर लड़ाई लड़ रहा है। चौथी औरपांचवीं सदी के दौरान हिप्पोक्रेट्स हुए थे। इन्हें मॉडर्न मेडिसिन का पिता कहा जाता है। उस दौरान इन्होंने पता लगाया कि अशुद्ध जल से ही बीमारियां होती हैं। तब इन्होंने दुनिया के सबसे पुराने वाटर फिल्टर्स में से एक को विकसित किया था। आज यह चुनौती काफी व्यापक हो गई है। अशुद्ध या दूषित जल ने जैवविविधता के साथ इंसान के कई समुदायों के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा कर दिया है।

आर्थिक चपत

प्रतिदिन करीब चार करोड़ लीटर गंदा पानी नदियों और स्वच्छ जल के अन्य स्नोतों में गिरता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊपर से आने वाले इस प्रदूषित पानी से डाउनस्ट्रीम इलाके की आर्थिक विकास को सुस्त करती है। इससे इन क्षेत्रों की जीडीपी वृद्धि में करीब एक तिहाई की गिरावट आती है। भारत जैसे विकासशील देश में इसका असर काफी ज्यादा दिखता है जिससे जीडीपी को करीब 50 फीसद का नुकसान पहुंचता है। एक दूसरे अध्ययन के अनुसार डाउनस्ट्रीम में प्रदूषित जल के कारण कृषि से आय में नौ फीसदकी गिरावट दिखती है। यही नहीं, कृषि पैदावार भी 16 फीसद तक घट जाती है।

 

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