लालू की ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली से माया की दूरी, जानिए कितनी महंगी पड़ेगी BSP-RJD की ये ‘भूल’…

पटना के गांधी मैदान में आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली कामयाब कही जा रही है. मोदी-नीतीश के खिलाफ लालू रैली में 17 विपक्षी दलों को एकजुट करने में सफल रहे, लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती इसमें शामिल नहीं हुईं. जानकार मानते हैं कि माया के इस कदम से लालू को ही नहीं बल्कि माया को भी सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है. लालू के लिए माया क्यों जरूरीलालू की 'भाजपा भगाओ, देश बचाओ' रैली से माया की दूरी, जानिए कितनी महंगी पड़ेगी BSP-RJD की ये 'भूल'...बड़ी खबर: CM नीतीश ने दिया बड़ा बयान, कहा- बकरीद से पहले ही बाढ़ पीड़ितों को दी जाए आर्थिक मदद

महागठबंधन से नाता तोड़ नीतीश कुमार ने बीजेपी के संग हाथ मिला लिया है. ऐसे में लालू को बिहार की सियासत में एक मजबूत आधार वाले साथी की जरूरत है, जिसके कंधे की ताकत के सहारे वो मोदी-नीतीश का मुकाबला कर सकें. इसी के मद्देनजर उन्होंने बिहार की सरजमीं पर विपक्षी दलों के नेताओं को एकजुट किया, लेकिन अंतिम वक्त में मायावती ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. महागठबंधन में नीतीश की कमी को सिर्फ मायावती ही पूरा कर सकती थीं.

बिहार में दलित मतदाताओं की संख्या करीब 20 फीसदी है, तो वहीं यादवों के वोट करीब 14 फीसदी हैं. ऐसे में यदि दोनों नेता साथ आते तो संयुक्त वोट प्रतिशत 34 फीसदी तक पहुंच जाता. इसके अलावा बिहार में मुसलमानों की आबादी भी करीब 17 फासदी है, जो फिलहाल लालू के साथ नजर आती है. लालू यादव मायावती के जरिए दलितों को करीब लाकर यादव, मुस्लिम और दलित का मजबूत समीकरण बनाकर मोदी-नीतीश से कड़ा मुकाबला कर सकते हैं. इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बाद बीएसपी देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, जिसे 4.1 फीसदी वोट मिले थे. ये बात अलग है कि वो इन वोटों की किसी सीट में तब्दील नहीं कर पाई और उसका स्कोर 00 रहा.

बिहार में बीएसपी का ग्राफ

बिहार की सियासत में बीएसपी की बहुत ज्यादा दखलअंदाजी नहीं है. बीएसपी के पिछले चुनाव में आए नतीजों से ये साफ समझा जा सकता है. बीएसपी ने 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में 225 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 2.07 फीसदी वोट मिले. इस लिहाज से वह सूबे की सातवें नंबर की पार्टी रही.

2010 में बीएसपी 239 सीटों पर लड़ी और तीन सीटों पर इसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे. बीएसपी को इस चुनाव में 3.21 फीसदी वोट मिले और इस लिहाज से वह छठी सबसे बड़ी पार्टी थी. 2005 विधानसभा चुनाव में बीएसपी 238 सीटों पर लड़ी और दो सीटें उसने जीतीं भी. वहीं 2000 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी अविभाजित बिहार की 324 में से 249 सीटों पर चुनाव लड़ी और पांच सीटें जीतने में कामयाब रही.

माया के लिए कितने काम के लालू

मौजूदा दौर की सियासत में लालू को ही मायावती की जरूरत नहीं है, बल्कि माया को भी अपने वजूद को बचाए रखने के लिए एक मजबूत आधार की जरूरत है. बीएसपी का मजबूत आधार उत्तर प्रदेश ही रहा है, लेकिन 2007 के बाद से लगातार उसका ग्राफ गिरता जा रहा है. आम चुनाव 2014 में बीएसपी का एक भी सांसद नहीं जीत सका और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी के महज 19 विधायक जीतने में कामयाब रहे. 

यूपी के साथ देश भर में भी बीएसपी का आधार कमजोर हुआ है. पिछले दिनों मायावती ने राज्यसभा से भी इस्तीफा दे दिया है. जबकि मौजूदा समय में वह इस स्थिति में भी नहीं हैं कि अकेले दम पर राज्यसभा या विधान परिषद में पहुंच सकें. ऐसे समय में लालू मायावती को बिहार से राज्यसभा भेजने की बात खुले तौर कह चुके हैं.

माया-अखिलेश की जोड़ी के मायने

मायावती के लिए अपने खिसकते जनाधार को बचाए रखने के लिए मजबूत आधार वाले साथी की जरूरत है. ऐसे में अगर वो 27 अगस्त को लालू के मंच पर होती तो विपक्षी की एकजुटता में उनका भी नाम शामिल होता. पटना में अखिलेश और मायावती एक मंच पर होते तो फिर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में यूपी में एक अलग तस्वीर दिखाई देती. बीएसपी के पास फिलहाल 22 फीसदी वोट हैं, तो वहीं एसपी के पास 21.8 फीसदी. ऐसे में दोनों के मत मिलाकर करीब 44 फीसदी के पास पहुंचता है.

इस मजबूत आधार के सहारे मोदी से उनका मुकाबला करना आसान होता. अखिलेश यादव खुलेतौर पर बीएसपी के साथ गठबंधन करने की बात कई बार कह चुके हैं. ऐसे में अब मायावती को फैसला लेना है कि वो अकेले ही सियासी जंग में उतरेंगी या फिर विपक्षी की एकजुटता के साथ खड़ी होंगी.

लालू की रैली में क्यों शामिल नहीं हुईं मायावती

मायावती महागठबंधन की रैली में शामिल होने से पहले सीटों के बंटवारे पर रुख स्पष्ट करना चाहती थीं. वो चाहती थीं कि ये बात साफ हो जाए कि किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी और सभी के बीच तालमेल की सहमति बन जाए. माया ने भी कहा था कि वो जल्दबाजी में कोई भी कदम उठाना नहीं चाहतीं. इस तरह के मोर्चे में शामिल होकर या रैली में हिस्सा बनकर तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला जब तक सीटों के तालमेल पर कोई सहमति न बन जाए.

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